कोरिओलिस बल क्या है? | फेरल का नियम | Coriolis Effect in Hindi

भौतिक भूगोल (Physical Geography) में कोरिओलिस बल एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण उत्पन्न होती है। यह बल पृथ्वी की सतह पर चलने वाली हवाओं, महासागरीय धाराओं, चक्रवातों तथा किसी भी गतिशील वस्तु की दिशा को प्रभावित करता है। UPSC, SSC, State PSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में यह विषय बार-बार पूछा जाता है।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि कोरिओलिस बल क्या है, यह कैसे कार्य करता है, फेरल का नियम क्या है, तथा पवनों, चक्रवातों और जलवायु पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है

साथ ही, दैनिक जीवन और प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण उदाहरणों के माध्यम से इस विषय को सरल और स्पष्ट रूप में समझने का प्रयास करेंगे।\

कोरिओलिस बल क्या है? (What is Coriolis Effect)

फ़्रांसीसी गणितज्ञ जी. जी. कोरिओलिस (1792- 1843) ने पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण पवन में होने वाले विक्षेपण (deflection) की सर्वप्रथम व्याख्या की और इसलिए इस बल को “कोरिओलिस प्रभाव” के नाम से जाना जाता है। 

कोरिओलिस बल (Coriolis Effect) भौतिक भूगोल की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो पृथ्वी के अपनी धुरी पर निरंतर घूर्णन करने के कारण उत्पन्न होती है।

वास्तव में यह कोई वास्तविक बल नहीं, बल्कि एक आभासी बल (Apparent Force) है, जिसका अनुभव पृथ्वी की सतह पर स्थित पर्यवेक्षक को होता है।

जब कोई वस्तु, जैसे पवन, महासागरीय धारा, मिसाइल या कोई अन्य गतिशील कण, पृथ्वी की सतह पर गति करता है, तो वह सीधी रेखा में न चलकर अपने मार्ग से थोड़ा विचलित हो जाता है।

इस विचलन की प्रक्रिया को ही कोरिओलिस प्रभाव कहा जाता है।

पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। इस घूर्णन के कारण पृथ्वी के विभिन्न अक्षांशों पर रैखिक वेग (Linear Velocity) समान नहीं होता। विषुवत रेखा पर यह वेग सर्वाधिक तथा ध्रुवों की ओर न्यूनतम होता जाता है।

जब कोई वायु राशि या वस्तु एक अक्षांश से दूसरे अक्षांश की ओर बढ़ती है, तो वह पृथ्वी की घूर्णन गति के साथ पूरी तरह सामंजस्य नहीं बिठा पाती और परिणामस्वरूप उसकी दिशा में विक्षेप उत्पन्न हो जाता है।

इसी कारण उत्तरी गोलार्ध में पवनें और महासागरीय धाराएँ अपनी गति की दिशा के दाईं ओर मुड़ जाती हैं, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में वही पवनें बाईं ओर मुड़ती हैं। इस नियम को सरल रूप में फेरल का नियम कहा जाता है।

फेरल का नियम क्या है? (Ferrel’s Law)

फेरल का नियम कोरिओलिस प्रभाव को समझने का एक सरल और व्यावहारिक नियम है। इस नियम का प्रतिपादन अमेरिकी वैज्ञानिक विलियम फेरल ने किया था।

फेरल के अनुसार पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण उत्पन्न कोरिओलिस बल, पृथ्वी की सतह पर गतिशील किसी भी वस्तु की दिशा को प्रभावित करता है।

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इस नियम के अनुसार, उत्तरी गोलार्ध में चलने वाली हवाएँ, महासागरीय धाराएँ अथवा अन्य गतिशील वस्तुएँ अपनी गति की दिशा के दाईं ओर विक्षेपित हो जाती हैं, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में वही वस्तुएँ बाईं ओर विक्षेपित होती हैं।

यह नियम वैश्विक पवन प्रणाली, जैसे व्यापारिक पवनें, पश्चिमी पवनें एवं ध्रुवीय पवनों की दिशा को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है।

फेरल का नियम यह भी स्पष्ट करता है कि कोरिओलिस बल का प्रभाव वस्तु की गति और उसके अक्षांश पर निर्भर करता है। जितनी अधिक गति होगी, विक्षेप उतना ही अधिक होगा तथा ध्रुवों की ओर जाते-जाते यह प्रभाव बढ़ता जाता है।

कोरिओलिस बल कैसे काम करता है?

कोरिओलिस बल की कार्यप्रणाली को समझने के लिए पृथ्वी की घूर्णन गति को समझना आवश्यक है। पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करती है।

इस घूर्णन के कारण विषुवत रेखा पर स्थित बिंदु को एक दिन में सबसे अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, जबकि ध्रुवों पर स्थित बिंदु लगभग स्थिर रहते हैं। परिणामस्वरूप विषुवत पर रैखिक वेग अधिक और ध्रुवों की ओर कम होता जाता है।

जब कोई पवन या वस्तु विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाती है, तो वह अपने प्रारंभिक अधिक वेग को बनाए रखने का प्रयास करती है, लेकिन जिस क्षेत्र में वह पहुँचती है वहाँ पृथ्वी की घूर्णन गति कम होती है।

इस असंतुलन के कारण वह वस्तु अपने सीधे मार्ग से दाईं या बाईं ओर मुड़ जाती है। इसी प्रकार यदि कोई वस्तु ध्रुवों से विषुवत की ओर आती है, तो उसका वेग अपेक्षाकृत कम होता है और वह पीछे रह जाती है, जिससे फिर से विक्षेप उत्पन्न होता है।

इस प्रकार कोरिओलिस बल वस्तु की गति, दिशा और पृथ्वी के अक्षांशीय स्थान के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है।

कोरिओलिस बल की विशेषताएँ

  • यह एक आभासी बल है, वास्तविक बल नहीं।
  • यह केवल गतिशील वस्तुओं पर कार्य करता है।
  • विषुवत रेखा पर इसका प्रभाव न्यूनतम (शून्य) होता है।
  • ध्रुवों की ओर इसका प्रभाव अधिकतम होता है।
  • पवन की गति जितनी अधिक होगी, विक्षेप उतना ही अधिक होगा।

कोरिओलिस बल का जलवायु पर प्रभाव

कोरिओलिस बल पृथ्वी की संपूर्ण जलवायु प्रणाली को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। यह बल न केवल पवनों की दिशा निर्धारित करता है, बल्कि महासागरीय धाराओं, वर्षा वितरण और चक्रवातों की प्रकृति पर भी गहरा प्रभाव डालता है।

सबसे पहले, वैश्विक पवन प्रणाली का निर्माण कोरिओलिस बल के बिना संभव नहीं होता। व्यापारिक पवनें विषुवत की ओर मुड़ती हैं, पश्चिमी पवनें मध्य अक्षांशों में पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं और ध्रुवीय पवनें ठंडे क्षेत्रों से गर्म क्षेत्रों की ओर जाती हैं। इन सभी पवनों की दिशा को नियंत्रित करने में कोरिओलिस बल की प्रमुख भूमिका होती है।

दूसरे, चक्रवातों और प्रतिचक्रवातों का घूर्णन भी इसी बल का परिणाम है। उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात घड़ी की विपरीत दिशा में तथा दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की दिशा में घूमते हैं।

विषुवत रेखा के समीप कोरिओलिस बल नगण्य होने के कारण वहाँ उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति नहीं हो पाती।

तीसरे, महासागरीय धाराएँ जैसे गल्फ स्ट्रीम और क्यूरोशियो धारा, कोरिओलिस बल के कारण अपने विशिष्ट मार्ग पर बहती हैं। ये धाराएँ तटीय क्षेत्रों की जलवायु को गर्म या ठंडा बनाकर वर्षा और तापमान के प्रतिरूप को प्रभावित करती हैं।

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कोरिओलिस बल के दैनिक जीवन के उदाहरण

  • लंबी दूरी की मिसाइलों का मार्ग – जैसे:- उत्तरी ध्रुव से Newyork शहर की ओर 1.6 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से छोड़ी गयी मिसाइल शिकागो शहर पर गिरेगी। 
  • तोप के गोलों की दिशा में परिवर्तन – जैसे:- 750 मीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से दागा गया तोप का गोला प्रत्येक 33 किलोमीटर पर 60 मीटर विक्षेपित हो जाता है। इसके अलावा 120 मीटर प्रति सेकंड की गति से निकली हुई बन्दूक की गोली एक सेकंड में 2.5 मीटर विक्षेपित हो जाती है।
  • हवाई जहाजों के नेविगेशन में सुधार

कोरिओलिस बल और चक्रवातों का संबंध

  • उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात घड़ी की विपरीत दिशा में घूमते हैं।
  • दक्षिणी गोलार्ध में चक्रवात घड़ी की दिशा में घूमते हैं।

यह अंतर पूर्णतः कोरिओलिस बल का परिणाम है।

कोरिओलिस बल का महत्व (Importance of Coriolis Effect)

  1. वैश्विक पवन प्रणाली को समझने में सहायक
  2. मौसम पूर्वानुमान में उपयोगी
  3. समुद्री नौवहन और विमानन में सहायक
  4. पृथ्वी की जलवायु संरचना को नियंत्रित करता है
  5. भौतिक भूगोल की आधारभूत अवधारणा

निष्कर्ष

कोरिओलिस बल पृथ्वी की घूर्णन गति का एक महत्वपूर्ण परिणाम है, जो पवनों, महासागरीय धाराओं और चक्रवातों की दिशा निर्धारित करता है। फेरल का नियम इस प्रभाव को सरल रूप में समझाता है। भूगोल के विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह विषय अत्यंत आवश्यक है।

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FAQs (कोरिओलिस बल क्या है? | Coriolis Force in Hindi):

प्रश्न 1. कोरिओलिस बल क्या है?

उत्तर: पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न वह आभासी बल जो गतिशील वस्तुओं को विक्षेपित करता है।

प्रश्न 2. फेरल का नियम क्या है?

उत्तर: उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विक्षेप का नियम।

प्रश्न 3. विषुवत रेखा पर कोरिओलिस बल क्यों नहीं होता?

यह बल पृथ्वी की सतह पर गतिमान वस्तुओं को विक्षेपित करता है, जिससे वे अपने पथ से दूर हो जाते हैं.

प्रश्न 4. कोरिओलिस बल का सबसे अधिक प्रभाव कहाँ होता है?

उत्तर: ध्रुवीय क्षेत्रों में।

अंत में,
उम्मीद करता हूँ कि अब आपको अच्छे से समझ में आ गया होगा कि कोरिओलिस प्रभाव क्या है या फेरल का नियम क्या है। अगर ये जानकारी आपको पसंद आयी हो तो इसे अपने दोस्तों में शेयर जरूर करे। यदि आपके कोई सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके जरूर बताये। इस ब्लॉग पर विजिट करने के लिए आपका शुक्रिया। 

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